बुधवार, 17 नवंबर 2010

पर आपने झूठ क्यों बोला

सुरेन्द्र सर्वेक्षण में लगी अपनी ड्यूटी करता हुआ, एक घर से दूसरे घर जा रहा था।
एक घर में उसे दो सदस्य मिले, बाप-बेटा।
उसने एक फार्म निकाला और अपने ढंग से भरने लगा। घर के मुखिया का नाम,पता,काम लिखने के बाद, पूछना शुरू किया-
"आटा कितना लग जाता होगा?"
"जितना मर्ज़ी लिख लो जनाब ! "
"फिर भी, बीस-पच्चीस किलो तो लग ही जाता होगा? "
"हाँ जी।"
"दालें कितनी खा लेते हो? "
"आप समझदार हो, लिख लो खुद ही।"
"पाँच-छह किलो तो खा लेते होंगे? "
"क्यों नहीं, क्यूँ नहीं।"
"घी? "
"खाते हैं जी।"
"वह तो परमात्मा की कृपा से खाते ही होंगे। कितना शुद्ध और दूसरा कितना? "
"देसी घी? वह तो आपने याद दिला दिया। दिल तो बहुत करता है।" उसके चेहरे पर जरा-सी उदासी आ गई।
"मीट-अण्डों का सेवन….?"
"परमात्मा का नाम लेते हैं जी, पर जी में बहुत आता है।" कहते हुए उसने एक गहरी साँस ली।
इसी तरह दो सौ साठ प्रश्नों वाला फार्म, सुरेन्द्र ने एक-एक करके भरा। पूरी बात हो जाने पर, सुरेन्द्र ने फार्म से अंदाजा लगाया और पूछा, "बाकी तो सब ठीक है, पर जो आपने बताया है, उससे अनुमान होता है कि आप कुछ ज्यादा नहीं बता पाए।"
इस बार बेटे ने जवाब दिया, "दरअसल सही बात बताएँ, हम घर में रोटी बनाते ही नहीं। हम बाप-बेटे दो आदमी यहाँ रहते हैं। बाकी तो गाँव में हैं। हमने एक होटलवाले से बात तय कर रखी है। दाल-रोटी सुबह,यूँ ही शाम को।"
सुरेन्द्र दोनों की तरफ टिकटिकी बाँधे देखता रहा…घंटा पौन लगाया फार्म भरने में और निकला..
"भई! ये क्या किया आपने….?"
"किया क्या बेटा ! पहले तो मुझे लगा कि मैं यह क्या बता रहा हूँ। फिर ज्यों-ज्यों तू पूछता रहा, मेरा मन किया कि तुझसे बातें जरूर करूँ।"
"पर आपने झूठ क्यों बोला?"
"झूठ कहाँ बोला बेटा। यह तो सब सच है। झूठ तो बेटा यह है जो हम अब गुजर कर रहे हैं।"

एक नया रिश्ता निकल आया था।

"मोगा से रास्ते की सवारी कोई न हो, एक बार फिर देख लो।" कहकर रामसिंह ने सीटी बजाई और बस अपने रास्ते पड़ गई।
बस में बैठे निहालसिंह ने अपना गाँव नजदीक आते देख, सीट छोड़ी और ड्राइवर के पास जाकर धीमे से बोला, "डरैवर साब जी, जरा नहर के पुल पर थोड़ा-सा ब्रेक पर पाँव रखना।"
"क्या बात है? कंडक्टर की बात नहीं सुनी थी?" डाइवर ने खीझकर कहा।
"अरे भई, जरा जल्दी थी। भाई बनकर ही सही। देख तू भी जट और मैं भी जट। बस जरा-सा रोक देना।" निहालसिंह ने गुजारिश की।
ड्राइवर ने निहालसिंह को देखा और फिर उसने भी धीमे से कहा, "मैं कोई जट-जुट नहीं, मैं तो मजबी हूँ।"
निहाले ने जरा रुककर कहा,"तो क्या हुआ? सिंख भाई हैं हम, वीर [भाई] बनकर रोक दे।"
ड्राइवर इस बार जरा-सा मुसकाया और बोला, "मैं सिक्ख भी नहीं हूँ, सच पूछे तो।"
"तुम तो यूँ ही मीन-मेख में पड़ गए हो। आदमी ही आदमी की दवा होता है। इससे बड़ा भी कुछ है।"
जब निहाले ने इतना कह तो ड्राइवर ने खूब गौर से उसको देखा और ब्रेक लगा दी।
"क्या हुआ?" कंडक्टर चिल्लाया, "मैंने पहले नहीं कहा था? किसलिए रोक दी?"
"कोई नहीं, कोई नहीं। एक नया रिश्ता निकल आया था।" ड्राइवर ने कहा और निहालसिंह तब तक नीचे उतर गया था।

फिर देखना तुम कितनी सुन्दर और जवान लगोगी।

मिस्टर खन्ना अपनी पत्नी के साथ बैठे जनवरी की गुनगुनी धूप का आनंद ले रहे थे। छत पर पति-पत्नी दोनों अकेले थे, इसलिए मिसेज खन्ना ने अपनी टाँगों को धूप लगाने के लिए साड़ी को घुटनों तक ऊपर उठा लिया।
मिस्टर खन्ना की निगाह पत्नी की गोरी-गोरी पिंडलियों पर पड़ी तो वह बोले, "तुम्हारी पिंडलियों का मांस काफी नर्म हो गया है। कितनी सुंदर हुआ करती थीं ये! "
"अब तो घुटनों में भी दर्द रहने लगा है, कुछ इलाज करवाओ न! " मिसेज खन्ना ने अपने घुटनों को हाथ से दबाते हुए कहा।
"धूप में बैठकर तेल की मालिश किया करो, इससे तुम्हारी टाँगें और सुंदर हो जाएँगी।" पति ने निगाह कुछ और ऊपर उठाते हुए कहा, "तुम्हारे पेट की चमड़ी कितनी ढलक गई है! "
"अब तो पेट में गैस बनने लगी है। कई बार तो सीने में बहुत जलन होती है।" पत्नी ने डकार लेते हुए कहा।
"खाने-पीने में कुछ परहेज रखा करो और थोड़ी-बहुत कसरत किया करो। देखो न, तुम्हारा सीना कितना लटक गया है! "
पति की निगाह ऊपर उठती हुई पत्नी के चेहरे पर पहुँची, "तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गई हैं, आँखों के नीचे काले धब्बे पड़ गए हैं।"
"हां जी, अब तो मेरी नज़र भी बहुत कमजोर हो गई है, पर तुम्हें मेरी कोई फिक्र नहीं है! " पत्नी ने शिकायत-भरे लहज़े में कहा।
"अजी फिक्र क्यों नहीं, मेरी जान ! मैं जल्दी ही किसी बड़े अस्पताल में ले जाऊँगा और तुम्हारी प्लास्टिक सर्जरी करवाऊँगा। फिर देखना तुम कितनी सुन्दर और जवान लगोगी।" कहकर मिस्टर खन्ना ने पत्नी को बाँहों में भर लिया।

उसके रहस्योद्घाटन ने मुझे सकते में डाल दिया।

अगले दिन लाल बाबू आफिस नहीं आए। पता चला कि रात को अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें रात को ही समीप के एक प्राइवेट हास्पिटल में भर्ती करना पड़ा। आॅफिस से हम कई लोग उन्हं देखने पहुँचे। अस्पताल के बाहर ही लाल बाबू की पत्नी और उनका बेटा हमें मिल गए। दोनों के चेहरे लटके हुए थे। लाल बाबू की पत्नी की आँखों से आँसू बह रहे थे। हम लोगों ने धीरे–धीरे सारे मामले की जानकारी ली। मालूम हुआ कि लाल बाबू को आई.सी.यू. में रखा गया है। उनके पेट में भयंकर दर्द है। किन्तु आई.सी.यू. में किसी को भी जाने की इजाजत नहीं है।
लाल बाबू अपनी ईमानदारी और सहृदयता के लिए हमेशा से जाने जाते रहे हैं। अत: हम लोगों की भी उनके प्रति गहरी संवेदना थी। हम लोग अस्पताल के प्रमुख प्रभारी से मिले और उनसे इलाज पर होने वाले खर्च का अनुमान पूछा। उन्होंने लगभग एक लाख रुपए का खर्चा बताया।
खैर, मैंने और गुप्ता ने मेडिकल एडवांस का फार्म भरा और डॉक्टर की सहमति लेकर एक लाख रुपए के लिए आवेदन किया! सुपरिडेंट साहब ने तुरन्त एक लाख का चेक बनवाकर हमारे हवाले कर दिया! चैक अस्पताल के प्रमुख प्रभारी के नाम था।
हमने चैक अस्पताल के काउन्टर पर जमा कर दिया और एक तरह से इलाज के खर्च से राहत महसूस की। लाल बाबू को अस्पताल में सात दिन रखा और उसके बाद मृत घोषित कर दिया गया।
लाल बाबू की मृत्यु की बात सुनकर उनकी पत्नी, बच्चे और परिजन दहाड़े मारकर रोने लगे।
तभी किसी सज्जन ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा तो मैंने मुड़कर देखा, कोइ्र अधेड़–सी उम्र का अपरिचित व्यक्ति मेरे सामने खड़ा था। वह धीरे से बोला,‘‘इधर आइए।’’ मुझ वह युवक एक तरफ ले गया और फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘भाई साहब, आपका वह आदमी तो जिस दिन भर्ती हुआ था, उसी दिन चल बसा था। आप सरकारी मुलाजिम हैं। आपने जो एडवांस का चैक जमा कराया था, उसकी रकम का एडजस्टमेंट करने के लिए तुम्हारे आदमी की लाख को इतने दिन तक आई.सी.यू. में रखा गया था।’’ इतना कह क रवह युवक तेजी से वहाँ से खिसक गया और अस्पताल में जाने कहाँ गुम हो गया! परन्तु उसके रहस्योद्घाटन ने मुझे सकते में डाल दिया।

रविवार, 7 नवंबर 2010

Is still shaking tail

Darwin had to say about human development the tail was the first human use but long absence, he gradually disappeared.
Scientists believe that the end of the spine still outstanding is the existence of the tail. They say that the evidence will be called with the science does not believe anything without proof.
So, he Gaha tail - will also be frequent shaking. If you wish to see the tail was moving if it is no longer possible. But many times the word is shaking, indicating that the tail is moving.
Well daily lives will find several examples. Professor says such things in front of some students come to know the other students that were hidden inside the tail will be moving. Some of the boss when "necessary to discuss" would be doing the rest of the office if people feel that the tail is moving. How often have in yearly People knowingly or unknowingly do so.
But the broader political statements as it often runs out.
Mastered the Congressmen's special. Nitish Kumar said that Rahul Gandhi becoming the prime minister before becoming chief government - the administration should understand. Came the reply from the Congress, "Chief Minister Atal Bihari Vajpayee, Rahul Gandhi could become prime minister without why not?"
Atal Bihari Vajpayee and his people who understand politics know that the tail is moving.
Before the Congress in Bihar, a spokesman said, "JP (Jai Prakash Narayan) and Rahul Gandhi have in common."
Large section of the Congress knows and believes that the biggest enemy of the Congress in the '70s was someone they were JP. But compared to someone in Bihar then JP would not have the big personality. That turned out to be the tail Hilly the tongue compared to the JP.
Before a gentleman 'Indira Is India' had said. He says "master stroke" was. I do not know why the scientists tested not tested but could not find evidence that time Pukhta's tail shaking.
Well it's not moving the tail has a monopoly of the Congress. Bharatiya Janata Party too often gives the evidence is.
BJP in a critical moment of gentle heart was moved, he said, "LK Advani, the iron man, like Vallabhbhai Patel."
Socialists also a late leader of the "small Lohia say 'was started.
"When will the sun moon Aflahँ name will live" as the slogan the feel of the group are shaking tail.
You could say that of all its - its tail, which is the wish, wave. But then the crisis stands the tail by ignoring people seem to accept the right slogans.
History has shown that India Indira ji to acknowledge their mistake, the evidence currently exists that Advani himself as Iron Man sitting values. Now look at James G. Puँchean was shaking even if they can not see will not know JP or AB. Or someone says they'll wait, "James is the nation."
Well knowledgeable people say that the development would not order ever in the opposite direction so there is no danger.
But to not use the tail may be missing the extra use if you have begun to rise again some day?

अब भी हिलती है पूँछ

डार्विन ने मानव विकास के बारे में कहा था कि पहले मानव की भी पूँछ होती थी लेकिन लंबे समय तक इस्तेमाल न होने की वजह से वह धीरे-धीरे ग़ायब हो गई.
वैज्ञानिक मानते हैं कि रीढ़ के आख़िर में पूँछ का अस्तित्व अब भी बचा हुआ है. वे ऐसा कहते हैं तो प्रमाण के साथ ही कहते होंगे क्योंकि विज्ञान बिना प्रमाण के कुछ नहीं मानता.
तो अगर पूँछ है तो वह गाहे-बगाहे हिलती भी होगी. अगर आप पूँछ को हिलता हुआ देखने की इच्छा रखते हों तो ऐसा अब संभव नहीं है. लेकिन कई बार ज़बान हिलती है तो इसके संकेत मिलते हैं कि पूँछ हिल रही है.
वैसे तो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे. प्रोफ़ेसर के सामने कुछ छात्र ऐसी बातें कहते हैं जिससे दूसरे छात्रों का पता चल जाता है कि भीतर छिप गई पूँछ हिल रही होगी. बॉस से कुछ लोग जब 'ज़रुरी बात पर चर्चा' कर रहे होते हैं तो दफ़्तर के बाक़ी लोग महसूस करते हैं कि पूँछ हिल रही है. इश्क में पड़े लोग तो जाने अनजाने कितनी ही बार ऐसा करते हैं.
लेकिन व्यापक तौर पर इसका पता अक्सर राजनीतिक बयानों से चलता है.
कांग्रेसियों को इसमें विशेष महारत हासिल है. नीतीश कुमार ने कहा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री बनकर शासन-प्रशासन को समझना चाहिए. तो कांग्रेस से जवाब आया, "जब अटल बिहारी वाजपेयी मुख्यमंत्री बने बिना प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो राहुल गांधी क्यों नहीं?"
जो लोग अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी राजनीति को जानते हैं वो समझ गए कि पूँछ हिल रही है.
इससे पहले बिहार में ही कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कहा था, "जेपी (जयप्रकाश नारायण) और राहुल गांधी में समानता है."
कांग्रेस का बड़ा तबका जानता और मानता है कि 70 के दशक में कांग्रेस का सबसे बड़ा दुश्मन कोई था तो वे जेपी ही थे. लेकिन बिहार में किसी से तुलना करनी हो तो जेपी से बड़ा व्यक्तित्व भी नहीं मिलता. इसलिए पूँछ हिली तो ज़बान से जेपी से तुलना ही निकली.
इससे पहले एक सज्जन 'इंदिरा इज़ इंडिया' कह चुके थे. कहते हैं कि वह 'मास्टर स्ट्रोक' था. पता नहीं क्यों वैज्ञानिकों ने जाँचा परखा नहीं लेकिन उस समय पूँछ हिलने का पुख़्ता प्रमाण मिल सकता था.
वैसे ऐसा नहीं है कि पूँछ हिलाने पर कांग्रेसियों का एकाधिकार है. भारतीय जनता पार्टी भी अक्सर इसके प्रमाण देती रहती है.
किसी नाज़ुक क्षण में एक भाजपाई सज्जन का दिल द्रवित हुआ तो उन्होंने कहा, "लालकृष्ण आडवाणी लौह पुरुष हैं, वल्लभ भाई पटेल की तरह."
समाजवादियों ने भी अपने एक दिवंगत नेता को 'छोटे लोहिया' कहना शुरु कर दिया था.
'जब तक सूरज चाँद रहेगा फलाँ जी का नाम रहेगा' वाला नारा जब लगता है तो सामूहिक रुप से पूँछ हिलती हैं.
आप कह सकते हैं कि सबकी अपनी-अपनी पूँछ है, जिसे जब मर्ज़ी हो, हिलाए. लेकिन संकट तब खड़ा होता है जब पूँछ को अनदेखा करके लोग नारों को सही मानने लगते हैं.
इतिहास गवाह है कि इंदिरा जी ने अपने को इंडिया मानने की ग़लती की तो वर्तमान में प्रमाण मौजूद हैं कि आडवाणी जी ख़ुद को लौह पुरुष ही मान बैठे. अब नज़र राहुल जी पर है वे भी अगर हिलती हुई पूँछें न देख सके तो पता नहीं जेपी हो जाएँगे या अटल. या कि वे इंतज़ार करेंगे कि कोई कहे, "राहुल ही राष्ट्र है."
वैसे तो ज्ञानी लोग कहते हैं कि विकास का क्रम कभी उल्टी दिशा में नहीं चलता इसलिए कोई ख़तरा नहीं है.
लेकिन उपयोग न होने से पूँछ ग़ायब हो सकती है तो अतिरिक्त उपयोग से अगर किसी दिन फिर बढ़नी शुरु हो गई तो?

एक बिहारी की नज़र से


बारह-तेरह साल पहले जानेमाने लेखक और पत्रकार अरविंद एन दास ने लिखा था, 'बिहार विल राइज़ फ़्रॉम इट्स ऐशेज़' यानी बिहार अपनी राख में से उठ खड़ा होगा.
एक बिहारी की नज़र से उसे पढ़ें तो वो एक भविष्यवाणी नहीं एक प्रार्थना थी.
लेकिन उनकी मृत्यु के चार सालों के बाद यानी 2004 में बिहार गया तो यही लगा मानो वहां किसी बदलाव की उम्मीद तक करने की इजाज़त दूर-दूर तक नहीं थी.
मैं 2004 के बिहार की तुलना सम्राट अशोक और शेरशाह सूरी के बिछाए राजमार्गों के लिए मशहूर बिहार से या कभी शिक्षा और संस्कृति की धरोहर के रूप में विख्यात बिहार से नहीं कर रहा था.
पटना से सहरसा की यात्रा के दौरान मैं तो ये नहीं समझ पा रहा था कि सड़क कहां हैं और खेत कहां.
सरकारी अस्पताल में गया तो ज़्यादातर बिस्तर खाली थे, इसलिए नहीं कि लोग स्वस्थ हैं बल्कि इसलिए कि जिसके पास ज़रा भी कुव्वत थी वो निजी डॉक्टरों के पास जा रहे थे.
इक्का-दुक्का ऑपरेशन टॉर्च या लालटेन की रोशनी में होते थे क्योंकि जेनरेटर के लिए जो डीज़ल सप्लाई पटना से चलती थी वो सहरसा पहुंचते-पहुंचते न जाने कितनों की जेब गर्म कर चुकी होती थी.
लगभग 60 प्रतिशत जली हुई एक 70-वर्षीय महिला को धूप में चारपाई पर लिटा रखा था और इंफ़ेक्शन से बचाने के लिए चारपाई पर लगी हुई थी एक फटी हुई मच्छरदानी!
ये वो बिहार था जहां लालू यादव 15 साल से सीधे या परोक्ष रूप से सत्ता पर काबिज़ थे.
लगभग छह सालों बाद यानि 2010 की अप्रैल में फिर से बिहार जाने का मौका मिला. काश मैं कह पाता कि नीतीश के बिहार में सब कुछ बदल चुका था और बिहार भी शाइनिंग इंडिया की चमक से दमक रहा था.
परेशानियां अभी भी थीं, लोगों की शिकायतें भी थीं लेकिन कुछ नया भी था.
अर्थव्यवस्था तरक्की के संकेत दे रही थी. हर दूसरा व्यक्ति कानून व्यवस्था को खरी खोटी सुनाता हुआ या अपहरण उद्दोग की बात करता नहीं सुनाई दिया.
दोपहर को स्कूल की छुट्टी के बाद साइकिल पर सवार होकर घर लौटती छात्राएं मानो भविष्य के लिए उम्मीद पैदा कर रही थीं.
डॉक्टर मरीज़ों को देखने घर से बाहर निकल रहे थे. उन्हें ये डर नहीं था कि निकलते ही कोई उन्हे अगवा न कर ले.
किसान खेती में पैसा लगाने से झिझक नहीं रहा था क्योंकि बेहतर सड़क और बेहतर क़ानून व्यवस्था अच्छे बाज़ारों तक उसकी पहुंच बढ़ा रही थी.
कम शब्दों में कहूं तो लगा मानो बिहार में उम्मीद को इजाज़त मिलती नज़र आ रही थी.
और एक बिहारी होने के नाते ( भले ही मैं बिहार से बाहर हूं) ये मेरे लिए बड़ी चीज़ है.
इस चुनाव में नीतीश कुमार समेत सभी राजनीतिक खिलाड़ियों के लिए बहुत कुछ दांव पर है बल्कि लालू-राबड़ी दंपत्ति का पूरा राजनीतिक भविष्य इस चुनाव से तय हो सकता है.
लेकिन बिहारियों के लिए दांव पर है उम्मीद. उम्मीद कि शायद अब बिहार का राजनीतिक व्याकरण उनकी जात नहीं विकास के मुद्दे तय करेंगे, उम्मीद कि बिहारी होने का मतलब सिर्फ़ भाड़े का मजदूर बनना नहीं रहेगा, उम्मीद कि भारत ही नहीं दुनिया के किसी कोने में बिहारी कहलाना मान की बात होगी.
और मुख्यमंत्री कोई बने मेरी उम्मीद बस यही है कि जिस उम्मीद की इजाज़त बिहारियों को पिछले पांच सालों में मिली है वो अब उनसे छिन न सके.