रविवार, 7 नवंबर 2010

भ्रष्ट गठजोड़

 जनता के मन में जो बात वर्षो से रह-रहकर उठती रही है, उसे सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी के जरिए रिकॉर्ड पर ला दिया है। आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपी एक सरकारी अधिकारी को निरपराध मानते हुए न्यायमूर्ति मरकडेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की बेंच ने जो निर्णय दिया, उससे निश्चित रूप से एक अलग संदेश समाज में गया है।

आंध्रप्रदेश के सहकारिता विभाग के एक जूनियर इंस्पेक्टर के पास सिर्फ 2.63 लाख रुपए मूल्य की आय से अधिक संपत्ति निकली, जिस पर निचली अदालत ने 1996 में उसे सश्रम कारावास की सजा सुना दी थी। इस बीच पिछले करीब 14 वर्षो में न जाने कितनी तारीखें उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय में लगी होंगी। वकीलों की फीस, यात्राओं, फोटो कॉपी, कोर्ट फी आदि में निश्चित ही 2.63 लाख से ज्यादा रुपए खर्च हुए होंगे। लेकिन मूल मुद्दा न्यायालय की उस मौजू टिप्पणी का है, जिससे सरकार को सीख लेनी चाहिए।

सरकार मगरमच्छों और शार्को को तो छोड़ देती है और छोटे अफसरों को प्रताड़ित करती है। यह कहा है सुप्रीम कोर्ट ने इस छोटे भ्रष्टाचार के मामले में। यह सर्वविदित है कि बड़े अफसर अक्सर नेताओं आदि से सांठगांठ कर हर तरफ से बच जाते हैं। भ्रष्ट नेता भी कम ही जेल जाते हैं या उनकी कुर्सी खिसकती है। एक बार यदि कुर्सी छिन जाती है तो कुछ दिनों के बाद जोड़-तोड़ और लेन-देन के जरिए फिर मिल जाती है। हमारे देश में सरकारी अफसर, राजनेता और अन्य प्रभावशील लोगों का दृश्य व अदृश्य गठबंधन काफी तगड़ा है। इसे तोड़ना मुश्किल भी है और शायद कोई चाहता भी नहीं कि यह टूटे। साधारण जनमानस इस गठजोड़ के खिलाफ है, पर उसकी सुनता कौन है। इस पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी और सरकार को लगाई गई फटकार का महत्व है।

दुख इस बात का है कि यह फटकार टीवी और अखबारों में दो-चार दिनों तक ‘खबर’ के रूप में रहेगी, फिर स्मृति से ओझल हो जाएगी। सरकार की कार्यप्रणाली इससे बदलेगी और बड़े, प्रभावशाली व ताकतवर सरकारी अफसर (आईएएस, आईपीएस आदि) डरेंगे और सुधरेंगे, यह कम संभव दिखता है। मुश्किल यह भी है कि लोकपाल, लोकायुक्त, सीबीआई, भ्रष्टाचार निवारक अन्य संस्थाओं के बढ़ते अधिकारों के बावजूद देश में अनैतिक दौलत का लोभ व आकर्षण कम होता नहीं दिखता। कॉमनवेल्थ गेम्स इसका ताजा और शर्मनाक उदाहरण हैं।

कब सुधरेंगे हम

 सुधारों के लिए यही सबसे सही समय है। आर्थिक सुधारों के लिए नहीं, बल्कि खेल संघों के ढांचे में सुधार के लिए। कॉमनवेल्थ खेल प्रारंभ होने से पहले उनकी तैयारियों को लेकर काफी हायतौबा मची थी, लेकिन भारत के खिलाड़ियों ने पदकों का शतक पूरा कर दिखाया। 

इससे एक बात तो सभी के मन में पूरी तरह साफ हो गई है (सिवाय हमारे राजनेताओं के) कि खेल संघों की मनमानीपूर्ण कार्यप्रणाली के बावजूद एथलीटों ने अपने बूते और अपने दमखम पर श्रेष्ठ प्रदर्शन कर देश का गौरव बढ़ाया है। प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने दो दशक पहले वित्त मंत्री के रूप में देश में आर्थिक सुधारों की शुरुआत करते हुए हमारे उद्योगों और व्यवसाय जगत को नियंत्रणों की बेड़ियों से मुक्त किया था। हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि वे एक बार फिर ऐसा ही कदम उठाते हुए नाकारा खेल संघों के ढांचे को ढहा देंगे।

कॉमनवेल्थ खेलों के पदकवीर हमारे खिलाड़ियों की कहानियां बेहद मार्मिक हैं। इनमें से कई गरीबी और अभावों से जूझते हुए यहां तक पहुंचे हैं। उन्होंने अपना जीवन खेलों को समर्पित कर दिया। कड़े प्रशिक्षण के जरिये अपनी प्रतिभा को निखारने के लिए उन्हें अपने परिवार से दूर तक रहना पड़ा। 

यहां तक कि साइना नेहवाल जैसे मध्यवर्गीय तबके से आने वाले खिलाड़ियों के परिवारों को भी अपने बच्चों के लिए बहुत कुर्बानियां देनी पड़ी हैं। लेकिन हर खिलाड़ी की कहानी से एक अहम कड़ी गुम है। और वह है उनकी सफलता में हमारे तथाकथित खेल संघों या संस्थाओं का योगदान, जिनकी सबसे पहले यह जिम्मेदारी थी कि वे खेल प्रतिभाओं को पहचानें और आगे बढ़ने में उनकी मदद करें।

उम्मीद की जानी चाहिए कि मनमोहन सिंह इस बात को समझेंगे कि विदेशी निवेश के साथ ही खेलों ने भी भारत की तरक्की की दास्तान में अहम भूमिका निभाई है। कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारियों में हुई ढीलपोल पर विदेशी मीडिया में जिस तरह नकारात्मक प्रचार हुआ, उससे निश्चित ही भारत की छवि को चोट पहुंची है। 

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के कीर्तिमान स्थापित करने के बावजूद इसमें कोई शक नहीं है कि बीजिंग ओलिंपिक का बेदाग आयोजन करने वाले चीन ने भारत पर बढ़त हासिल कर ली है। इससे एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन करने की भारत की क्षमता पर सवालिया निशान लगे हैं।

हमारे यहां खेलों की स्थिति में सुधार लाने में सबसे बड़ी अड़चन हैं खेल संघों के न्यस्त स्वार्थ। आर्थिक सुधारों से पहले जो हैसियत नॉर्थ ब्लॉक और उद्योग भवन की थी, आज वही स्थिति खेल संघों और संस्थाओं की है। 

मजे की बात यह है कि इस र्ढे को बनाए रखने में सभी राजनीतिक दल एकजुट हैं। इस बहस से क्रिकेट को बाहर रखा जा सकता है, क्योंकि बीसीसीआई कामयाबी की एक शानदार कहानी है, अलबत्ता मुसीबतें उसकी भी कम नहीं। लेकिन अन्य खेल संघ तो सत्ता के अखाड़े बन चुके हैं, जहां काबिज होने के लिए राजनीतिक दलों के बीच खूब खींचतान होती है।

हमारा राष्ट्रीय खेल हॉकी लंबे समय से राजनेताओं और नौकरशाहों की इसी आपसी रस्साकशी का शिकार होता आ रहा है। ऐसी स्थिति में खिलाड़ियों को अपने बूते ही खुद को साबित करना पड़ता है। हमारी हॉकी टीम ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कॉमनवेल्थ खेलों में रजत पदक हासिल किया था। बैडमिंटन संघ ने तो स्वर्ण पदक जीतने वाली खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा को उसकी उपलब्धियों के लिए ठीक से शुभकामनाएं तक नहीं दीं।

जब भारत के खिलाड़ियों ने कॉमनवेल्थ खेलों में १क्१ पदक जीत लिए, तब ये खबरें भी आने लगीं कि राजनेताओं के बीच खेलों की सफलता का सेहरा अपने सिर बांधने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। ऐसे अवसर पर उस लड़की के हौसले को बड़ी आसानी से भुला दिया जाता है, जो दस हजार मीटर दौड़ में इसलिए कांस्य पदक जीतने में कामयाब हो पाई, क्योंकि उसे पानी भरने के लिए रोज कई किलोमीटर तक दौड़ लगाकर जाना पड़ता था। 

या तीरंदाजी में स्वर्ण पदक जीतने वाली वह लड़की, जिसके पिता ऑटो रिक्शा चलाते हैं। अगर खेल संघों के भ्रष्ट और जर्जर ढांचे के बावजूद हमारे खिलाड़ियों ने शीर्ष स्तर पर सफलताएं हासिल की हैं तो उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि इस ढांचे में बहुत पहले ही सुधार हो जाना था।

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

हमारे राजनेता सचमुच परिपक्व हो गए हैं?

अयोध्या पर आया फैसला और इसके बाद किसी तरह की हिंसा-मारकाट का न होना जनता और खासकर राजनीतिक दलों की नई भावनात्मक परिपक्वता का संकेत है। यह परिपक्वता क्षणिक है या स्थायी, इसका निर्णय समय करेगा। 

फिलहाल यही लग रहा है कि नेताओं ने खुद को इसलिए रोक रखा है क्योंकि मीडिया की निगाह उनकी गतिविधियों पर है। आम जनता की धर्म-केंद्रित भावनाओं का राजनेता जिस तरह दोहन करते रहे हैं, उसे देखते हुए उनकी भावनात्मक परिपक्वता पर यह अविश्वास स्वाभाविक है।

सोशल इंटेलीजेंस पर अपनी पुस्तक में डेनियल गोलमैन ने कहा है कि हमारा मस्तिष्क सामाजिक स्थितियों में विशिष्ट तरीके से प्रतिक्रिया करने का आदी होता है। नेता एक खास तरह के व्यवहार का प्रदर्शन करें और समाज से भी उसकी उम्मीद करें, तो वह उन्हें जरूर मिलेगा। 

जरूरत है कि हम नई पीढ़ी के नेताओं की ओर देखें और उनसे पूछें : क्या उनमें ऐसी परिपक्वता है; वे हमें बेहतरी की ओर ले जाएंगे या पतन की ओर? परिपक्वता हालांकि उम्र के साथ आती है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, पिछले अनुभवों, ज्ञान व सीख के आधार पर आलोचनात्मक होने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जाती है। 

हमारी सामाजिक बुद्धिमत्ता एक सीमा से आगे विकसित नहीं हो पाती। क्या हमें भाजपा के युवा नेतृत्व में ऐसे विकास के चिह्न् दिखाई देते हैं या हम उन्हें ऐसे विवादित मुद्दों की तलाश में देख रहे हैं, जो हमें उकसाएं लेकिन जरूरी नहीं कि बेहतर देश बनने में मदद करें? क्या नितिन गडकरी, शिवराजसिंह चौहान, सूर्य प्रताप शाही, अनुराग ठाकुर और वरुण गांधी जैसे युवा नेता हमें उच्च धरातल पर ले जाएंगे? यही सवाल कांग्रेस से भी पूछने की जरूरत है। 

सचिन पायलट, जितेंद्र प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रिया दत्त, मिलिंद देवड़ा व अन्य युवा नेता क्या हमें विवेकपूर्ण रास्ते पर ले जा रहे हैं, जो आम लोगों के हित में है, या वे भी ऐसे विभाजक भावुक मुद्दे की खोज में हैं, जो थोड़े समय के लिए जनसमूह को जोड़ सके। इस यूथ ब्रिगेड के कर्णधार राहुल गांधी देशभर में युवा कांग्रेस की सदस्यता के लिए लोगों को आकर्षित करने का अभियान चला रहे हैं। लेकिन वह आज के युवाओं से कह क्या रहे हैं? 

वे हमारे भावनात्मक अतीत को छेड़ रहे हैं या हमारे विवेकशील भविष्य को जगा रहे हैं? उनके अभियान के पीछे कोई रणनीति है या यह युक्ति भर है? अधिकांश नेता रणनीति और युक्ति में अंतर नहीं समझ पाते। हमारे धर्मग्रंथ इसकी अच्छी व्याख्या करते हैं। 

जब विष्णु अपनी सवारी गरूड़ को रणभूमि का निरीक्षण करने को कह रहे थे, तब वह आगे के लिए विश्व दृष्टिकोण व रणनीतिक दृष्टि विकसित करने की कोशिश कर रहे थे। रणनीति और कुछ नहीं गरूड़ दृष्टि है। आपको अपने चारों ओर की घटनाओं पर विश्व दृष्टिकोण तैयार करना होता है। 

व्यापक दृष्टिकोण यह होगा कि जनसमूह को कौन-सी चीज आकर्षित करेगी और समर्थकों की फौज कैसे तैयार होगी। क्या हम अपने युवा राजनीतिक नेताओं में ऐसी रणनीतिक विचारशीलता देख रहे हैं? क्या उनका विजन हमें प्रेरित करता है? क्या उनके पास विश्व में हो रही घटनाओं को लेकर गरूड़ दृष्टि है और क्या उनकी युक्तियां इसी विश्व दृष्टि से निकली हैं? 

क्या बराक ओबामा या अन्य नेता में हमें यह गरूड़ दृष्टि दिखाई देती है। जब ओबामा ने अपने ‘यस वी कैन’ चुनाव अभियान की रूपरेखा तैयार की थी, उन्होंने इन तीन शब्दों में अपने राष्ट्र की आकांक्षाओं को समाहित कर लिया था। लेकिन विष्णु जब सर्प की शैया पर विराजमान कृष्ण अवतार में होते हैं तब उनके पास सर्प दृष्टि है। 

उनकी दृष्टि संकुचित है और सर्प की तरह वह केवल वही देख पाते हैं जो उनकी आंखों के आगे हो रहा है। यह युक्ति-केंद्रित तरीका है और हमारा राजनीतिक नेतृत्व आजकल इसी पर फोकस है। दुनिया की युक्तियों की उनकी समझ अच्छी है और वे युवा नेताओं को भी युक्तियां सिखा रहे हैं। अयोध्या फैसले पर उनकी प्रतिक्रिया सर्प दृष्टि की परिणति थी या गरूड़ दृष्टि की? रणनीतिपूर्ण थी या युक्तिपूर्ण? भावनात्मक थी या विवेकपूर्ण?

युक्तिपूर्ण फैसले सांप की तरह तेज और आक्रामक हो सकते हैं। ये अपनी सीमित दृष्टि के सामने आने वाली किसी भी वस्तु या हलचल पर हमला कर सकते हैं। यह घटनाओं के प्रति भावुक प्रतिक्रिया है और हमारे मस्तिष्क के भावनात्मक हिस्से से आती है। 

रणनीतिक फैसले बेहतर समझ के साथ लिए जाते हैं और यह देश, संगठन या जनसमूह की दिशा को बदल या प्रभावित कर सकते हैं। जब बात समाज को गढ़ने की हो, तो ये फैसले मस्तिष्क के सामाजिक व विवेकशील हिस्से से आते हैं। 

वैज्ञानिकों में अभी इस बात पर मतभेद है कि क्या हमारी सामाजिक बुद्धिमत्ता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता हमारे मस्तिष्क के भीतर जुड़ जाती हैं, ताकि हम अपने युक्तिपूर्ण फैसलों पर भी रणनीतिक तरीके से काम कर सकें। इन दिनों मानव मस्तिष्क को लेकर सबसे ज्यादा शोध इसी पर हो रहे हैं। 

राजनीतिक नेतृत्व को और ऊंचे मानकों की आवश्यकता है। उन्हें सामाजिक बुद्धिमत्ता को रणनीतिक विचारों के साथ जोड़ने की जरूरत है। उनकी सामाजिक बुद्धिमत्ता उन्हें जनसमूहों को नेतृत्व प्रदान करने में मदद करेगी, जबकि उनकी रणनीतिक समझ उन्हें विरोधियों की युक्तिपूर्ण योजना से ऊपर उठने में मदद करेगी। 

कुछ अवसरों पर वे युक्तिपूर्ण व भावनात्मक तरीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन उनके मूल समर्थक हमेशा ऊंचे लक्ष्यों की वकालत से ही आएंगे। जनता व्यक्तियों के पीछे नहीं चलती, वह उन विचारों के पीछे चलती है, जिनका समय आ गया है। 

पहले विष्णु फिर लक्ष्मी

हमारे देश में पैसे के मायने कई हैं। पैसा, रुपैया, रोकड़ा, पेटी, धन, दौलत या लक्ष्मी। जितने नाम हैं, उतने ही अर्थ हैं और ये हर पीढ़ी के साथ बदल रहे हैं। इसमें हमेशा नए अर्थ जुड़ते जा रहे हैं। हमने माता-पिता को हमेशा यह कहते सुना है कि वे कितना कम कमाते थे, फिर भी कितने खुश थे। 

कई बार हम भी सोचते हैं कि जब हम पैसे को लेकर इतने चिंतित नहीं रहते थे और उसके पीछे इस तरह भागते नहीं थे, तब हम ज्यादा खुश थे। कई लोगों के लिए काम करने का मतलब है धन कमाना। वे सिर्फ पैसे के लिए काम करते हैं। 

उनकी कामकाजी जिंदगी आजीविका कमाने के सिवा कुछ नहीं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो इसलिए काम नहीं करते क्योंकि उन्हें पैसा कमाना है। ऐसे लोग कम हैं लेकिन हैं। मगर अब दुनिया के सबसे धनी भी यह कहने लगे हैं। 

अगर एक धनवान व्यक्ति कहे कि वह विश्व की जटिल समस्याओं को हल करना चाहता है, यही उसका मकसद है, धन उसका लक्ष्य नहीं है। तो उसे यह कहकर झटक देंगे कि अरे, वह इतना अमीर है, जब नून-तेल की चिंता न हो तो जो चाहे वह कर सकता है। 

मगर हम अपनी बुनियादी जरूरतें और सुविधाएं पूरी करने में लगे रहते हैं : बच्चों के लिए खाने और पढ़ाई का इंतजाम, माता-पिता की देखभाल और सहायता, मकान खरीदना, फिर कार और फिर बैंक में इतना पैसा हो कि आगे की जिंदगी सुरक्षित रहे। जबकि दुनिया के सबसे अमीर आदमी वारेन बफे कहते हैं कि उन्हें धन का महत्व तब समझ में आया जब मंदी के दौर से गुजर रहे थे और उनके परिवार के पास पैसा नहीं था। 

आज स्थिति यह है कि इस साल उन्होंने अपना 99 फीसदी धन व संपदा अपने जीवनकाल के दौरान ही परोपकार के कामों के लिए दान कर दी है। बफे कहते हैं कि वह भाग्यशाली थे कि उन्हें बहुत सारे लोगों का सहयोग मिला जिसके कारण वह कामयाब हो सके। अब वह दुनिया की मदद करके यह उपकार चुकाना चाहते हैं।

वारेन बफे के अजीज दोस्त और दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेट्स ने भी अपनी दौलत दुनिया में शिक्षा की हालत को सुधारने और बीमारियों पर नियंत्रण के कामों में लगाने के लिए दान कर दी है। बिल और वारेन ने दुनिया के 20 अन्य बेहद दौलतमंद लोगों को राजी किया कि वे अपनी दौलत अपने जीवनकाल में ही दुनिया की समस्याएं हल करने के लिए दान कर दें। 

यह धन उनके जीते ही परोपकार के कामों में लगाया जाएगा, उनके मरने के बाद नहीं। इसको भी हम नकार सकते हैं कि इन दौलतमंदों ने समाज से ही इतनी बेहिसाब धन-संपत्ति कमाई थी और इसलिए समाज को लौटा देना उनका कर्तव्य बनता है। अब वे अपना यही कर्तव्य पूरा कर रहे हैं।

लेकिन अमीरी या संपदा की इस धारणा के पीछे एक बड़ा विचार छिपा है। इस विचार की मूल प्रेरणा कहीं और नहीं, हमारे वेदों में है। सच्ची दौलत या संपदा पैसे के पीछे भागने से नहीं आती। जो लोग वास्तव में कामयाब और खुश हैं, वे ऐसे लोग नहीं जो हमेशा पैसे के पीछे भागते रहे हों। 

स्टीव जॉब्स दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बनना नहीं चाहते, वे सिर्फ नई रचना करना चाहते हैं, जिनके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। नंदन नीलकनी और ज्यादा दौलतमंद व्यक्ति बनना नहीं चाहते। वह अरबपति तो हैं ही। वह अपने देश में ऐसे बदलाव लाना चाहते हैं जिनसे सामाजिक योजनाओं का लाभ सचमुच उन लोगों तक पहुंचे जिनके लिए वे बनाई गई हैं।

ऐसा क्यों है कि पैसे के पीछे भागने से हमें और ज्यादा पैसा नहीं मिलता। इसके पीछे वेदों में एक कहानी बताई गई है। इंद्र देवों के देव हैं, लेकिन संपदा की देवी से उनका रिश्ता चाह या इच्छा का है। यही कारण है कि वह लक्ष्मी के पीछे भागते रहते हैं और लक्ष्मी उनसे दूर भागती रहती हैं। 

उधर विष्णु हैं जो लक्ष्मी के पीछे नहीं भागते और नतीजा यह होता है कि जब वह शेषनाग पर विराजमान रहते हैं, लक्ष्मी उनके चरणों में बैठी रहती हैं। लक्ष्मी विष्णु के प्रति नतमस्तक क्यों हैं और देवों के देव इंद्र के सामने क्यों नहीं? जब विष्णु शेषनाग पर आरूढ़ होते हैं, तब वे सृष्टि की समस्याओं के बारे में विचार कर रहे होते हैं। 

विष्णु का सच्च रूप यही है जिसमें उनके दिमाग में मनुष्य जाति को परेशान करने वाली बड़ी समस्याएं होती हैं और वह उनके समाधान के रास्ते खोज रहे होते हैं। नेतृत्व करने वाले लोगों का भी एक विष्णु रूप होता है और वह समय के साथ विकसित होता व निखरता है। लेकिन उसमें धन की कोई भूमिका नहीं होती। वह ऐसा कर पाते हैं तो इसीलिए कि उन्होंने धन के बारे में चिंता करना छोड़ दिया है।

धन की यही बड़ी विचित्र बात है। अगर आप उसके पीछे दौड़ेंगे तो वह आपको नहीं मिलेगा। लेकिन अगर आप ज्यादा बड़े लक्ष्य साधेंगे तो वह आपके पीछे चला आएगा। हमारी युवा पीढ़ी कभी-कभी यह सीख बिल्कुल भूल जाती है। 

अगर हम अपने युवाओं के नायकों पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि वे सभी अमीर और धनवान लोग हैं। उनके नायकों ने जो अकूत धन-दौलत बनाई है, उससे वे मोहित हैं और उनकी सारी दिलचस्पी उनके जैसे अमीर होने में है। आज लोग एक शानदार सॉफ्टवेयर इंजीनियर नहीं बनना चाहते, वे बिल गेट्स, स्टीव जॉब्स या नंदन नीलकनी की तरह धनवान बनना चाहते हैं।

यह विरोधाभास आज हमारी मुश्किल है। हमारे सारे लक्ष्य भौतिक हो गए हैं। यहां तक कि हमारे देश की सरकार का भी घोषित लक्ष्य प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना है। वह जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में तेज गति से हो रही बढ़ोतरी को हमारी तरक्की का पैमाना बताती है। जीडीपी में विभिन्न क्षेत्रों में देश की आमदनी और उत्पादन को जोड़ा जाता है। 

इसमें जो उछाल हर साल दर्ज हो रही है, उसके आधार पर दावा किया जा रहा है कि हम अपने लक्ष्य हासिल कर रहे हैं। जबकि हमारे पड़ोस में छोटे-से देश भूटान को लीजिए। उसने हैप्पीनेस इंडेक्स को अपना लक्ष्य बनाया है। 

वहां के नरेश कहते हैं कि वह चाहते हैं उनके देश के लोग सिर्फ अमीर न हों, बल्कि खुश भी हों। अगर खुश रहने के लिए उन्हें धन कमाना जरूरी है तो धन कमाएं, लेकिन खुशी के लिए दूसरी चीजें भी जरूरी हो सकती हैं।

यही कारण है कि महालक्ष्मी की पूजा से पहले हम पार्वती के 16 अन्य रूपों की पूजा करते हैं। गौरी, पद्मा, साची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वहा, मातारो, लोकमात्राह, ह्रस्तिह, पुष्टिस्तथा, टुस्ती, आत्मकुलदेवतारे। सवाल यह है कि हम लक्ष्मी की पूजा के लिए तो तैयार हैं, लेकिन क्या हम सारी जिंदगी सिर्फ लक्ष्मी की ही पूजा करते रहेंगे? इस दीवाली पर यह बड़ा सवाल है।

ऐश्वर्य और फिर उसके त्याग का पागलपन

अपार दौलत का स्वामी एक राजकुमार गौतम बुद्ध की प्रेरणा से संन्यास के लिए प्रेरित हुआ। राज्य की जनता हैरान थी। संसार के सभी सुखों के अभ्यस्त राजकुमार ने अचानक आखिर यह फैसला क्यों लिया? हुआ यह कि बुद्ध के नगर आगमन पर राजकुमार उनके पास गया और चरणों पर गिरकर बोला मुझे दीक्षा दीजिए, मैं सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन त्याग दूंगा। उनके साथ आए राजकर्मचारी चकित रह गए।

उन्होंने बुद्ध से पूछा कि यह चमत्कार है, यह कैसे हुआ। आपने आखिर ऐसा क्या किया कि राजकुमार में इतना भारी परिवर्तन आ गया। बुद्ध ने कहा, मैंने कुछ नहीं किया। यह मन का चमत्कार है। मन के लिए एक छोर से दूसरे छोर तक जाना बड़ा आसान है। जो व्यक्ति धन-संपदा के पीछे पागल नहीं, वह उसे त्याग भी नहीं सकता। 

जो व्यक्ति संपदा के पीछे भाग रहा था, जो सुखों के उपभोग में डूबा हुआ था, वही जब संपदा का त्याग कर देता है, तब भी उसके पास वह पागलपन बचा रहता है। जबकि संसार के ज्यादातर प्राणी मध्यमार्गी बने रहते हैं। उनमें न संपदा के उपभोग का पागलपन होता है, न उसके परित्याग का। - 

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

कुछ समझ नहीं आ रहा, भारत किधर जा रहा

कुछ समझ नहीं आ रहा, भारत किधर जा रहा है! इसे कौन चला रहा है, यह पता करना भी आसान नहीं है। इसे डॉ मनमोहन सिंह का मंत्रिमंडल चला रहा है या सोनिया गांधी का सलाहकार मंडल? या फिर भारत का उच्चतम न्यायालय? हमारी सरकार जिस तरह न्यायालय की डांट रोज खाती है और उसे पचाती है, इससे पता चलता है कि उसका हाजमा काफी ठीक-ठाक है। हमारी सरकार के क्या कहने? वह आत्म-मुग्ध है। आठ-नौ प्रतिशत की विकास दर ने उसे बौरा दिया है। 

इस झुनझुने को बजाती हुई वह सारी दुनिया में नाचती फिर रही है। जिस दुनिया के आगे वह नाच दिखाती है, यह वही दुनिया है, जिसका चरम लक्ष्य है - विकास दर! विकसित राष्ट्र वही है, जिसकी विकास दर ऊंची हो, जिसकी प्रतिव्यक्ति आय मोटी हो, जिसका सकल राष्ट्रीय उत्पाद खरबों में हो और जो विश्व राजनीति के अखाड़े में आर्थिक खम ठोंक सकता हो। भारत इसी भेड़-चाल पर चल रहा है।

मुग्धा नायिका की तरह भारत सरकार आंकड़ों के रूप, रस, गंध में डूबी हुई है। उसे दाएं-बाएं देखने की फुर्सत नहीं है। उसे क्या पता कि करोड़ों लोग सिर्फ 20 रुपए रोज पर गुजारा कर रहे हैं? उसे इस बात का भान ही नहीं कि भारत में 40 प्रतिशत शिशु पैदाइशी अधमरे होते हैं। 

करोड़ों लोग इस देश में रोज भूखे पेट सोते हैं। गर्मियों में लू से और सर्दियों में ठंड से मर जाते हैं। देश की लाखों पाठशालाओं में बच्चों के नीचे टाटपट्टी और ऊपर छत तक नहीं होती। हर साल 20-22 करोड़ बच्चे प्राथमिक शालाओं में भर्ती होते हैं, लेकिन बीए तक पहुंचते-पहुंचते उनकी संख्या 50 लाख भी नहीं रहती। उसे पता ही नहीं कि हर साल करोड़ों बच्चे फेल क्यों होते हैं और शिक्षा से पिंड क्यों छुड़ा लेते हैं? जितने अशिक्षित लोग भारत में हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं। 

प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा जितना सच बोलता है, उससे ज्यादा झूठ बोलता है। देश में होने वाली कुल आय में कुल जनसंख्या का भाग देकर बताया जाता है कि हर आदमी की आय तीन-चार हजार रुपए प्रतिमाह है। क्या यह सच है? क्या दुनिया में आज तक कोई सरकार ऐसी बनी है जो अपनी संपूर्ण राष्ट्रीय आय को अपने सभी नागरिकों में बराबर-बराबर बांट दे? इस देश में जितने करोड़पति हैं, किसी अन्य देश में नहीं हैं और जितने कौड़ीपति हैं, उतने भी किसी अन्य देश में नहीं। इस खाई को पाटने नहीं, छिपाने का काम करता है, प्रतिव्यक्ति आय का आंकड़ा।

यदि भारत की प्रतिव्यक्ति आय बढ़ रही है तो जीवनस्तर की विश्व तालिका में उसका स्थान नीचे क्यों खिसकता जा रहा है? पिछड़े अफ्रीकी देशों के मुकाबले भारत के अनेक क्षेत्र मात क्यों खा रहे हैं? इस देश में शिक्षा और चिकित्सा की जैसी दोगली व्यवस्था है, वैसी शायद दुनिया में कहीं नहीं है। 

मुट्ठीभर लोगों के बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं और पब्लिक के बच्चे टाटपट्टी स्कूलों में! दो हजार से 15 हजार रुपए माहवार फीस कितने लोग दे सकते हैं? ये लोग अपना पेट काटकर इतनी फीस क्यों भरते हैं? क्योंकि इन पब्लिक स्कूलों और सरकारी नौकरियों के बीच हमारी सरकारों ने एक गुप्त सुरंग बिछा रखी है। उस सुरंग का नाम है अंग्रेजी। अंग्रेजी की इस सुरंग में घुसते ही आप नौकरी हथियाने के हकदार बन जाते हैं। 

इस सुरंग को जब तक उड़ाया नहीं जाएगा, भारत के सभी नौजवानों को नौकरियों के समान अवसर कभी नहीं मिलेंगे। न ही भारत के सभी नागरिक कभी शिक्षित होंगे। सर्वशिक्षा अभियान जल्द ही दम तोड़ देगा। अनिवार्य शिक्षा कानून मजाक बनकर रह जाएगा। यदि किसी विषय में बच्चे सबसे ज्यादा फेल होते हैं तो वे अंग्रेजी में ही होते हैं। 

भारत में जब तक अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहेगा, मुट्ठीभर मालदार, शहरी और ऊंची जाति के लोग गुलर्छे उड़ाते रहेंगे और करोड़ों गरीब, ग्रामीण और पिछड़े लोग नरक भोगते रहेंगे। आठ-नौ प्रतिशत की विकास दर की मलाई भी यही वर्ग छानता है। इसी वर्ग ने खरबों रुपए की काली कमाई स्विस बैंकों में छिपा रखी है। हजारों रुपए रोज का इलाज, महंगे कपड़े-जूते-जेवर, वातानुकूलित मकान और 36 पकवानों वाला रसीला भोजन भी इस देश में इसी वर्ग को उपलब्ध है। इन्हीं सबल लोगों ने शेष भारत को निबल बना रखा है।

इसी वर्ग ने भारत के राज्यतंत्र और अर्थतंत्र को अपनी मुट्ठी में कर रखा है। भारत के महाबली दिखने वाले नेतागण इसी वर्ग के हाथ के खिलौने हैं। ‘कॉमनवेल्थ (यानी अंग्रेज के पूर्व गुलाम देश) गेम्स’ में जिस बेरहमी और बेशर्मी से गरीब जनता का अरबों रुपया खाया गया है, क्या किसी अन्य देश में ऐसा होना संभव है? वह रुपया अभी तक वसूला क्यों नहीं गया? संबंधित नेताओं और अफसरों को अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? उनकी चल-अचल संपत्ति अभी तक जब्त क्यों नहीं की गई? 

क्या उन्हें कभी कड़ी सजा मिलेगी? महाराष्ट्र में जिस मकान-सोसायटी का भ्रष्टाचार आजकल उछल रहा है, जरा गौर कीजिए कि उसका नाम क्या है? आदर्श सोसायटी! कैसी विडंबना है कि महाराष्ट्र के लिए कोई ऐसा नया मुख्यमंत्री ढूंढ़ना मुश्किल हो रहा है, जो भ्रष्टाचारमुक्त हो। 

लालू यादव के अलावा देश में आज तक कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री क्या कभी जेल की सींखचों के पीछे गया है? भारत की गिनती दुनिया के सबसे भ्रष्ट देशों में होती है। ऐसे भ्रष्ट राष्ट्र का प्रधानमंत्री यदि ईमानदार है, तो अपने आप में यह अच्छी बात है, लेकिन इस ईमानदारी का फायदा क्या है? यह ईमानदारी देश में चल रही सारी बेईमानी की ढाल बन गई है। 

आपके जिस मंत्री पर उच्चतम न्यायालय उंगली उठा रहा है, उसे आप छू तक नहीं सकते। क्यों? क्योंकि ईमान से ज्यादा कुर्सी प्यारी है। कुर्सी खिसक न जाए, कुछ जातिवादी नेता समर्थन वापस न ले लें, सरकार टिकी रहे, इसीलिए जातीय जनगणना जैसा राष्ट्रघाती विष पीने के लिए हमारी सरकार तैयार हो गई है। यदि परमाणु सौदे के लिए आप अपनी सरकार दांव पर लगा सकते थे तो ईमानदारी और राष्ट्रीय एकात्म के लिए क्यों नहीं लगा सकते?

देश का सत्ता-पक्ष जितना लचर है, उतना ही लचर-पचर विपक्ष भी है। जनता को भी अब गुस्सा नहीं आता। महंगाई और भ्रष्टाचार भी उसे जगा नहीं पाते। क्या वजह है कि ग्रामीण रोजगार योजना और सूचना का अधिकार जैसे ब्रrास्त्र जंग लगे चाकू बन गए हैं? हमारे राजनीतिक दलों के पास ऐसे नेताओं का टोटा हो गया है, जो कश्मीरियों और माओवादियों से सीधे बात कर सकें। उन्हें संन्यासियों और पत्रकारों को घसीटना पड़ रहा है। दक्षिण एशिया भारत का प्रभाव-क्षेत्र है, लेकिन अफगानिस्तान और नेपाल की दुर्दशा पर भारत की अकर्मण्यता दर्दनाक है। 

चीन हमें अरुणाचल, कश्मीर, वीजा और पाकिस्तान के परमाणुकरण पर धकियाए जा रहा है और हम समझते हैं कि ओबामा की खुशामद करके हम इस व्याधि पर पार पा लेंगे। हमारा सारा ध्यान विकास-दर और पैसा कमाने पर केंद्रित है। हम यह नहीं जानते कि हम भारत को किधर ले जा रहे हैं। 

भारत में सब ठीक-ठाक ही चल रहा है।

मोटे तौर पर देखें तो भारत में सब ठीक-ठाक ही चल रहा है। 

न हम किसी युद्ध में फंसे हैं, न कोई दंगे हो रहे हैं, न चीन और पाकिस्तान की तरह हजारों लोग बाढ़ में मर रहे हैं, न सरकार के गिरने की कोई नौबत है। विकास दर में बढ़ोतरी हो रही है, महंगाई थोड़ी घटी है, करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है, श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों को हम करोड़ों रुपए यों ही दे देते हैं। हमारे दिल्ली जैसे शहर यूरोपीय शहरों से होड़ ले रहे हैं। 

हजारों करोड़ रुपए हम खेलों पर खर्च कर रहे हैं तो फिर रोना किस बात का है? देश में एक अजीब-सा माहौल क्यों बनता जा रहा है? खासतौर से तब जबकि देश के दो प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा पक्ष और विपक्ष की भूमिका निभाने की बजाय पक्ष और अनुपक्ष की तरह गड्ड-मड्ड हो रहे हैं? 

ऐसा क्या है, जो देश को दिख तो रहा है, लेकिन समझ में नहीं आ रहा है?,जो समझ में नहीं आ रहा, वह एक पहेली है। पहेली यह है कि देश में संसद है, सरकार है, राजनीतिक दल हैं, लेकिन कोई नेता नहीं है? सोनिया गांधी लगातार चौथी बार कांग्रेस अध्यक्ष चुनी गईं। रिकॉर्ड बना, लेकिन कोई लहर नहीं उठी। डॉ मनमोहन सिंह ने भी रिकॉर्ड कायम किया। नेहरू और इंदिरा के बाद तीसरे सबसे दीर्घकालीन प्रधानमंत्री हैं, लेकिन वे हैं या नहीं हैं, यह भी देश को पता नहीं चलता। 

आध्यात्मिक दृष्टि से यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है। ऐसी स्थिति, जिसमें होना न होना एक बराबर ही होता है। इसमें जरा भी शक नहीं कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच जैसा सहज संबंध है, वैसा सत्ता के गलियारों में लगभग असंभव होता है। भारत में सत्ता के ये दो केंद्र हैं या एक, यह भी पता नहीं चलता। न तो उनमें कोई तनाव है और न ही स्वामी-दास भाव है, जैसा कि हम व्लादिमीर पुतिन और दिमित्री मेदवेदेव के बीच मास्को में देखते हैं।

इसी प्रकार सत्ता पक्ष और विपक्ष देश में है तो सही, लेकिन कहीं कोई चुनौती दिखाई नहीं पड़ती। छोटे-मोटे क्षेत्रीय दल जो कांग्रेस के साथ हैं, उनके नेता भ्रष्टाचार के ऐसे मुकदमों में फंसे हुए हैं कि कांग्रेस ने जरा स्क्रू कसा नहीं कि वे सीधे हो जाते हैं। 

जिस बात का वे निरंतर विरोध करते हैं, उसी पर दौड़कर समर्थन दे देते हैं। जैसा कि परमाणु सौदे पर पिछली संसद में हुआ था। कांग्रेस का हाल भी वही है। वह उनके ब्लैकमेल के आगे तुरंत घुटने टेक देती है। जिस जातीय गणना का कांग्रेस ने 1931 में और आजाद भारत में सदा विरोध किया, अब कुछ जातिवादी क्षेत्रीय दलों के दबाव में आकर उसने अपनी नेता की भूमिका तज दी और अब वह उन अपने समर्थक दलों की पिछलग्गू बन गई है।

सत्तारूढ़ कांग्रेस सत्ता पर आरूढ़ जरूर है, लेकिन कई मुद्दों पर वह पत्ता भी नहीं हिला सकती। इससे भी ज्यादा दुर्दशा विपक्षी दलों की है। कम्युनिस्ट पार्टियां अभी भी मुखर हंै, लेकिन पिछले चुनाव में वे अपने गढ़ों में ही पिट गईं। उनका आपसी लत्तम-धत्तम इतना प्रखर हो गया है कि उनके मुखर होने पर देश का ध्यान ही नहीं जाता। जोशी-डांगे-मुखर्जी और नंबूदिरिपाद की कम्युनिस्ट पार्टियों में आज के जैसा संख्या-बल नहीं था, लेकिन वाणी-बल था, जो सारे देश में प्रतिध्वनित होता था। 

नेहरू जैसे नेता को भी उस पर प्रतिक्रिया करनी पड़ती थी। आजकल यही पता नहीं चलता कि वामपंथ का असली प्रवक्ता कौन है। मार्क्‍सवादी पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने परमाणु-हर्जाना विधेयक का विरोध जरूर किया, लेकिन वह नक्कारखाने में तूती की तरह डूब गया। वे दिन गए, जब लोहिया के पांच-सात लोग पूरी संसद को अपनी चिट्टी उंगली पर उठाए रखते थे। अब दिन में दीया लेकर ढूंढ़ने निकलो तो भी कोई समाजवादी नहीं मिलता। 

इतनी बड़ी संसद में क्या एक भी सांसद ऐसा है, जो लोहिया की तरह पूछ सके कि प्रधानमंत्रीजी, आप पर 25000 रुपए प्रतिमाह कैसे खर्च हो रहे हैं और आम आदमी तीन आने रोज पर कैसे गुजारा करेगा? अब तो पूंजीवादी, समाजवादी, साम्यवादी, दक्षिणपंथी और वामपंथी- सभी एक पथ के पथिक हो गए हैं। 

सबसे बड़े विपक्षी दल के तौर पर भाजपा जबर्दस्त भूमिका निभा सकती थी, लेकिन वह बिना पतवार की नाव बन गई है। उसका अध्यक्ष भी कांग्रेस अध्यक्ष की तरह आसमान से उतरने लगा है। वह अपने नेताओं के कंधों पर बैठा है, लेकिन उसके पांव नहीं हैं। उसे पांव की जरूरत भी क्या है? 

भाजपा में हाथ-पांव ही हाथ-पांव हैं। यह कार्यकर्ताओं की पार्टी ही तो है। इसमें गलती से एक नेता उभर आया था। उसे जिन्ना ले बैठा। अब कांग्रेस की तरह भाजपा के शिखर पर भी शून्य हो गया है। ये शून्य-शिखर आपस में जुगलबंदी करते रहते हैं। शून्य-शिखरों की इस जुगलबंदी में से कुछ समझौते निकलते हैं और कुछ शिष्टाचार निभते हैं, लेकिन कोई वैकल्पिक समाधान नहीं निकलते। भारत की राजनीति में से द्वंद्वात्मकता का तिरोधान हो गया है। 

यह एकायामी (वन डायमेंशनल) राजनीति नौकरशाहों और सरकारी बाबुओं के कंधों पर टिकी हुई है। इसमें पार्टियों की भूमिका गौण हो गई है। जनता और सरकार के बीच पार्टी नाम का सेतु लगभग अदृश्य हो गया है। जब पार्टी ही अप्रासंगिक हो गई है तो नेता की जरूरत कहां रह गई है? बिना नेता के ही यह देश चला जा रहा है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा अजूबा है। बाबुओं के दम पर बाबुओं का राज चल रहा है। आम जनता के प्रति हमारे बाबुओं का जो रवैया होता है, वही आज हमारे नेताओं का है।

देश में अगर आज कोई नेता होता तो क्या वह अनाज को सड़ने देता? यह ठीक है कि उच्चतम न्यायालय को ऐसे मामलों में टांग नहीं अड़ानी चाहिए, लेकिन भूखों को मुफ्त बांटने के विरुद्ध ऐसे तर्क वही दे सकता है, ‘जाके पांव फटी न बिवाई’! सरकार तो सरकार, विपक्ष क्या कर रहा है?

वह उन गोदामों के ताले क्यों नहीं तुड़वा देता? धरने क्यों नहीं देता? सत्याग्रह क्यों नहीं करता? भ्रष्टाचार क्या सिर्फ केंद्र में है? क्या राज्य सरकारें दूध की धुली हुई हैं? भाजपा और जनता दल के राज्यों में कोई चमत्कारी कदम क्यों नहीं उठाया जाता? माओवादियों से पांच-सात राज्य ऐसे लड़ रहे हैं, जैसे वे पांच-सात स्वतंत्र राष्ट्र हों। क्यों हो रहा है, ऐसा? इसीलिए कि देश में कोई समग्र नेतृत्व नहीं है। चीनियों के आगे भारत को क्यों घिघियाना पड़ रहा है? 

कश्मीर में कोरे शब्दों की चाशनी क्यों घुल रही है? कोई बड़ी पहल क्यों नहीं हो रही है? इसीलिए कि भारत की राजनीति के बगीचे में सिर्फ गुलदस्ते सजे हुए हैं। इन गुलदस्तों में न कोई कली चटकती है और न फूल खिलते हैं। जो फूल सजे हुए हैं, उनमें खुशबू भी नहीं है। भारत का नागरिक समाज या चौथा खंभा भी इतना मजबूत नहीं है कि वह नेतृत्व कर सके। इसके बावजूद भारत है कि चल रहा है। अपनी गति से चल रहा है। शिखरों पर शून्य है तो क्या हुआ? मूलाधार में तो कोई न कोई कुंडलिनी लगी हुई है